कुछ तो शर्म करो?

कसूर किसका जिनके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों के घर पत्थर नहीं फेंका करते...मगर उन्हें कौन समझाए? क्या वह नहीं जानते कि हमाम में सभी नंगे हैं? जब खुद का दामन ही पाक-साफ न हो तो दूसरे को कैसे खराब कहा जा सकता है। क्या राजनीति अब सिर्फ बदले की भावना तक ही सीमित... [पूरी पोस्ट]
writer सचिन मिश्रा
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[30 Jul 2009 15:22 PM]

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