साधनाओं में तुम

bhardwaj'sblog हो हवाओं में तुम सब दिशाओं में तुम;रम रहीं मेरे मन की गुफाओं में तुम। झांकता हूँ शरद रात्रि में जब गगन,दीखतीं चंद्रमा की कलाओं में तुम।हो गया है निगाहों में कैसा असर,मुझको लगती हो जलती शमाओं में तुम। मैंने लिखने को जब भी उठाई कलम,गीत ग़ज़लों में प्रहसन... [पूरी पोस्ट]
writer chandrabhan bhardwaj
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[09 Sep 2009 02:26 AM]

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