वक़्त की हथेली पर फैलीं
वक़्त की हथेली पर फैलीं तेरी मेरी खामोशियाँ साँसों में घुलती सी जातीं तेरी मेरी नजदीकियाँ चुपके से दबे पाँव आकर बाहों में लेती ये तन्हाइयां बंद पलकों में समेटती ख्वाबों में तेरी परछाइयां सोचता हूँ कहीं ये वही प्यारा सा इश्क तो नहीं...
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अनिल कान्त :
poetry
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[25 Nov 2009 01:37 AM]



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