इस पिघलती शाम.....

चंद मुट्ठी अशआर इस पिघलती शाम को अपना बनाया जाएउसका ज़िक्र छेड़ो, कुछ सुना-सुनाया जाएआंखों में खलल देती है शमअ बेवफाबुझा दो इसे, वफ़ा का सबक सिखाया जाएअक्सर ख़याल-ऐ-यार ही देता है खुमारीज़रा जाम भी भरो यारों, इसे और बढाया जाएगहराया है नशा, ज़रा तेज़ रक्स होगहरा गई है रात,... [पूरी पोस्ट]
writer dushyant

रक्स

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[11 Sep 2009 03:37 AM]

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