एक शहर ऐसा भी

Mera Apna Jahaan वो शहर जहाँ रंगत है खनकती चूडियों की वो शहर जहाँ की गलियों में खोया हुआ है कहीं बचपन वो शहर जहाँ बितायी थीं कई शामें दोस्तों की टोली में वो शहर जहाँ से पुकारते हैं वो धुंधले होते हुए चेहरे वो शहर मुझे बुलाता है ख्वाबों में रोज़ आता है हर शख्स जहाँ था... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :

poem

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[30 Jul 2009 13:31 PM]

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