"धरातल की थालियाँ"
"धरातल की थालियाँ"नैनो के पलक द्वार परदस्तक देती रही सिसकियाँकांपते अधर बोल ना पाएअंगारे बन धधकती रही हिचकियाँ तेरे दर्श का मेघ आकरप्रत्यक्ष में बरसा नहींशून्य के प्रचंड प्रहार सेबुझ गयी आशाओं की दिप्तियाँ यथार्थ के धरातल की थालियाँशोर कर चोकन्नी हो...
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seema gupta
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[13 Sep 2009 22:00 PM]



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