हमारे मिलने से

ज्ञानघर ( मित्रों के लिए )वे दूर-दूर तक नहीं थे,पल भर पहले,अचानक आते, घुमड़ते,चमकते,गरजते और बरसते हैं बादलदम धरती है धरती चैन लेता है मौसमहमारे मिलने सेगौर करो, बहुत कुछ होता है।देह पर तन आती छायाबहार की मोहक मायाझूमते पेड़, बलखाती डालियां,आनंद से कांपती... [पूरी पोस्ट]
writer ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay)

kavita

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[20 Sep 2009 05:47 AM]

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