फेट, ट्रस्ट, होप

विचार करने के लिए कुछ विचार मुझे याद आता है दुष्यंत की रचना का एक टुकड़ा। मैं बेपनाह अंधेरे को सुबह कैसे कहूं, मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं .....। कविता किसी दूसरे अर्थ में लिखी गयी है, पर मुझे इसका जो मतलब समझ में आता है, उसका नजारा कराना चाहूंगा। नजारों की नजर यह है कि जो... [पूरी पोस्ट]
writer Kaushal

भविष्य की चिंताएं

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[25 Sep 2009 14:05 PM]

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