अम्मी जान और अजान
मूंछो ने खुल कर जीना भी न सीखा था। बचपना जा नहीं रहा था और जवानी को हम लिवाने कश मारते फ़िर रहे थे। स्कूल गर्मी की छुट्टियों के लिए बंद हुए ही थे। धूप और लू सुबह से ही जान लेवा हो जाती और ऐसे में रमजान का महिना । कल्लन सारे रोजे रखेंगे, दादी ने कहा है......
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rajkumar jha
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[06 Sep 2009 01:26 AM]



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