कमरा
वो तस्वीर तिरछी है दीवार पे अब भीकॉफी के वो प्याले यूँ ही मेज पे रखे हैंना गयी हैं सिलवटें तेरे छुअन की अब तकना हटा है तेरी गर्म साँसों का वो दागतकिये में अब भी है तेरे गेसू की खुशबूबिस्तर से अब भी लिपटी है वो चादरज़ुम्बिश हर क़तरे में बाकी है कुछ ऐसेके...
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केतन कनौजिया 'शाइर'
नज्में
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[17 Sep 2009 04:42 AM]



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