हमदर्द मगर कोई बनाया करो ‘श्रद्धा’
सबको गले से तुम न लगाया करो ‘श्रद्धा’हमदर्द मगर कोई बनाया करो ‘श्रद्धा’ बैठा करो कुछ देर चराग़ों को बुझा करआँखें कभी खुद से, न चुराया करो ‘श्रद्धा’ जाया करो मेले कभी, बागों में भी टहलोहंस-हंस के भरम ग़म का मिटाया करो ‘श्रद्धा’ बंदूक-तमंचे से जो घिर जाए...
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श्रद्धा जैन
shrddha jain
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[10 Sep 2009 11:04 AM]



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