अफ़ज़ल से हम हिसाब करें

shahroz  ka rachnasansaar यह मीनारों मेहनत से उठती अज़ानेंमशीनों में ढलते यह ग़म के तरानेनए साल की खै़रियत चाहते हैंइबादत में डूबे यह कल कारख़ानेयह माटी की महिमा है, माथे से लगा लोयह पत्थर की मूरत है, सर को झुका लोयह लाशें तरसती रही hain कफ़न कोनए साल में पहले इसको संभालोबहुत पहले... [पूरी पोस्ट]
writer शहरोज़

new year2010

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[31 Dec 2009 03:13 AM]

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