सिंदूरदान (एक पौराणिक आख्यान) भाग - 2
पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.गतांक से आगे...परन्तु क्या यह सब इतना ही सहज था..एक ओर तो क्षोभग्रस्त महारानी लज्जा शोक और पापबोध से घुली जा रही थीं, तो दूसरी ओर कणाद भी मोह और विवेक के मध्य छिड़े गहन द्वंद में घिरा अपना मत और करनीय स्थिर करने में...
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रंजना
धर्म
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[24 Sep 2009 23:44 PM]



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