सच और झूठ के बीच ---- कुछ जगह खाली है ....
नग्न आकाश के नीचे -मैं कितनी ही देर---तन के मेह में भीगती रही ,वह कितनी ही देरतन के मेह में गलता रहाफिर बरसों के मोह को --एक जहर की तरह पी करउसने कांपते हाथों सेमेरा हाथ पकडा !चल ! क्षणों के सिर परएक छत डालेंवह देख !परे --सामने ,उधरसच और झूठ के बीच...
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रंजना [रंजू भाटिया]
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[17 Sep 2009 08:46 AM]



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