जिंदगी क़तरा-क़तरा गुज़रती है...

अर्ज़ है... महीने की पहली तारीख़ गुज़र गई, लेकिन एकाउंट में पैसा अभी तक नहीं पहुंचा था। एक-एक दिन पहाड़ जैसा लग रहा था। जेब पूरी तरह खाली थी, पेट भरने से ज्यादा किस्तें अदा करने की फिक्र थी। खाना खाये बगैर भूखे रह लेंगे, लेकिन चैक बाउंस होने के बाद जो हालत होगी,... [पूरी पोस्ट]
writer अबयज़ ख़ान
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[04 Aug 2009 02:54 AM]

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