एक चिट्ठी का इंतज़ार...

अर्ज़ है... दरवाज़े पर टकटकी लगाए आंखे एक अदद चिट्ठी का इंतज़ार करती हैं... मन करता है कि साइकिल की घंटी सुनाई पड़े और दौड़कर दरवाज़े पर चले आयें, शायद कोई चिट्ठी आई हो, शायद कोई संदेशा आया हो, शायद कोई अपना हो, जिसने हाले-दिल लिखकर भेजा हो... लेकिन न तो साईकिल की... [पूरी पोस्ट]
writer अबयज़ ख़ान
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[05 Aug 2009 00:44 AM]

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