बेचारे पिता और पति

अर्ज़ है... पिता और पति.. दुनिया के किसी भी समाज के लिए इनकी वेल्यू एक जैसी ही है... एक मर्द की तमाम ज़िंदगी इन दो अल्फ़ाज़ों का बोझ ढोते-ढोते गुज़र जाती है... समाज में जब रिश्तों को नाम देने का चलन आया होगा, तो किसी को इस बात का गुमान नहीं होगा, कि जितने छोटे ये... [पूरी पोस्ट]
writer अबयज़ ख़ान
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[19 Sep 2009 10:53 AM]

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