चुभन
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरेवक्त फिर भी मजाक करता हैहजारों कोशिशें करता हूं भुलाने की मगरमेरा जमीर रह-रहकर सवाल करता है,धंसा खंजर गवाही देता हैमसला कत्ल का है दिखाई देता हैमगर साबित कौन करेगासाजिशों के शिकंजों से लड़कर सच कोआज भी सच भी डरा-डरा...
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मिथिलेश श्रीवास्तव
कविता
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[08 Aug 2009 14:10 PM]



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