यही गलतफहमी थी शायद....

तपती रेत वो आए तो हो गया यकीं हमको..एक इसी की आरजू थी शायद।दरख्तों के रोने का इल्म ना था,परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद।फिक्र ना थी कि पाना है तुम्हे,फिक्र तो जुदाई की थी शायद।दामन-दामन जर्रा जर्रा बुत बना,उसीके होने से रौनक थी... [पूरी पोस्ट]
writer तरूश्री शर्मा
views
8
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[29 Jul 2009 03:21 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix