हम तो हैं परदेस में
हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांदअपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चांदजिन आँखों में काजल बनकर तैरी काली रातउन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांदरात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोरआँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चांदचांद बिना हर दिन यूँ...
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Bijen Salam
राही मासूम रज़ा
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[26 Sep 2009 04:56 AM]



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