वे चुप हैं
हत्यारे की शाल कीगुनगुनी ग़र्मी के भीतरवे चुप हैंवे चुप हैंगिनते हुए पुरस्कारों के मनकेकभी-कभी आदतन बुदबुदाते हैंएक शहीद कवि की पंक्तियाँउस कविता से सोखते हुए आग वे चुप हैंवे चुप हैंमन ही मन लगाते आवाज़ की कीमतसंस्थाओं की गुदगुदी गद्दियों में करते केलिसारी...
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अशोक कुमार पाण्डेय
चुप/पाश/विकल
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[20 Aug 2009 00:07 AM]



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