शायद अतृ्प्ति ही मनुष्य का प्रारब्ध है!!!

धर्म यात्रा विधाता ने जब इस सृ्ष्टि की रचना की तो एक अत्यंत सुन्दर देहधारी जीव का निर्माण किया और उसे नाम दिया मनुष्य। तब उससे बोले " जाओ भद्र्! ये पृ्थ्वी तुम्हारा क्रीडास्थल है,बुद्धि-ग्यान समर्थ दस इन्द्रियां तुम्हारे पास हैं;यथेष्ट सुखोपभोग करने के लिए जैसा उचित... [पूरी पोस्ट]
writer पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

सुख

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[06 Sep 2009 12:10 PM]

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