हम तो रिसर्च कर रहे हैं आटा दाल पे.

डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद. ग़ज़लवो तो उलझ के रह गये गोरी की चाल पे.हम तो रिसर्च कर रहे हैं आटा दाल पे.सूखे पड़े थे कोई उन्हें पूछता न था,बारिश हुई तो आ गये नाले उछाल पे.अँधों को रोशनी से कोई वास्ता नहीं,पाबन्दी वो लगा रहे जलती मशाल पे.मँहगी हुई है ज़िन्दगी सस्ती है मौत क्यों... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[14 Sep 2009 08:17 AM]

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