हम तो रिसर्च कर रहे हैं आटा दाल पे.
ग़ज़लवो तो उलझ के रह गये गोरी की चाल पे.हम तो रिसर्च कर रहे हैं आटा दाल पे.सूखे पड़े थे कोई उन्हें पूछता न था,बारिश हुई तो आ गये नाले उछाल पे.अँधों को रोशनी से कोई वास्ता नहीं,पाबन्दी वो लगा रहे जलती मशाल पे.मँहगी हुई है ज़िन्दगी सस्ती है मौत क्यों...
[पूरी पोस्ट]
डॉ.सुभाष भदौरिया.
9
0
0
0
0
[14 Sep 2009 08:17 AM]



Shuffle








