निर्झर
नूतन देहयष्टि का लिया
प्रथम आलिंगन
अनछुए बदन में
मचली सिहरन !
तन-बदन के सहस्त्र छोर
तक सका न जिन्हें कोई और
चप्पा-चप्पा, हर इक पोर
तुम्हारे स्पर्श से हुए विभोर !
सूर्य-किरण जहाँ न जा पाए
उन अँधियारों में जा समाए
हो तुमसे आत्मसात
मचले अरमान !
बाँहों में...
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Veena
hindi poetry
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[31 Jul 2009 15:06 PM]



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