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सहज साहित्य(SAHAJ SAHITYA) कमला निखुर्पा हिन्दी! ना बनना तुम केवल माथे की बिन्दी, जब चाहा सजाया माथे पर, जब चाहा उतारा फेंक दिया। हिन्दी! तुम बनना हाथों की कलम, और जनना ऐसे मानस पुत्रों को, जो कबीर बन फ़टकारे, जाति धर्म की दीवारें तोड़ हमें उबारे। जो सूर बन कान्हा की नटखट केलियाँ... [पूरी पोस्ट]
writer सहज साहित्य

हिन्दी कमला निखुर्पा

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[16 Sep 2009 01:23 AM]

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