सुनती हूँ यह सब डरी हुई
बहुत दिनों बाद कोई कविता छाप रही हूँ। कुछ मित्रों को सुनाया तो इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया आई। फिलहाल इसे कुछ और कविताओं के साथ जयपुर के एक अखबार डेली न्यूज में छपने के लिए भेज दिया है। उसके पहले यहाँ पढ़ें।सुनती हूँ यह सब कुछ डरी हुईमैं बाँझ नही हूँनहीं...
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आभा
मेरी कविता
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[30 Aug 2009 18:10 PM]



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