एक अभिव्यक्ति
[राजीव जी अग्रवाल हमारे करीबी दोस्त तब बने जब हम इपस्विच में एक हिंदू मन्दिर की आवश्यकता के बारे में बात करते थे। फ़िर वो भारत चले गए और काफ़ी समय तक हमारी बात नहीं हुई। कल ही उन्होंने जब ये कविता भेजी तो सुखद आश्चर्य हुआ कि उनके भीतर एक कवि भी विराजमान...
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मुकेश बंसल
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[18 Sep 2009 17:51 PM]



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