मौन सभी प्रतिध्वनियां, तब भी
आंखों में चुभने लग जाये काँटा बन कर उगी रोशनीधागा धागा छितरा जाये, सुधियों की रंगीन ओढ़नीजब विराम का इक पल बढ़ कर पर्वत सा उँचा हो जायेजब अपनी खाई सौगंधें पड़ जायें खुद आप तोड़नीउस पल मन का वीरानापन और अधिक कुछ बढ़ जाता हैकोशिश तो करता है स्वर, पर गीत नहीं...
[पूरी पोस्ट]
Geetkaar
10
0
0
0
0
[01 Sep 2009 21:46 PM]



Shuffle








