इस नये वर्ष में
चाँदनी से बना अल्पना द्वार परइस नये वर्ष का आओ स्वागत करेंआस सपने नये आस के रच रहीकोई क्रम फिर न दुहराये गत वर्ष कावो अनिश्चय, वो संशय की काली घटाहर निमिष यों लगा युद्ध का पर्व थाअर्थ की नीतियों की जड़ें खोखली फिर न रह पायें बीते दिनों की तरहदीप विश्वास...
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राकेश खंडेलवाल
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[31 Dec 2009 07:45 AM]



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