प्रगति मैदान के पुस्तक मेले से खबरें अच्छी नहीं हैं...
किताबों की खुसर-फुसर... भाग-४ “...स्टॉल में रखी किताबें एकदम अकेली हैं। उनका अकेलापन अस्तित्ववादी नयी कविता और नयी कहानी के अकेलेपन से ज्यादा बड़ा सच है और भयावह है। दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता। दिखते हैं तो ऊँघते प्रकाशक और उनके कर्मचारी। लोग उनतक...
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सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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[06 Sep 2009 19:00 PM]



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