झूठे ख्वाब

कुछ मेरी कलम से -kuch  meri kalam se ** मैं ख्वाब देखती हूँऔर तुम्हे भी संग उनकेजहान में ले जाती हूँजानती हूँ यह ख्वाब हैसिर्फ़ .....चंद लम्हों के ...जो बालू की तरह हाथ से फिसल जायेंगेपर जब यह बंद होते हैंपलकों में .. तो अपने लगते हैंबंद मुट्ठी में भी यह सपनेकुछ पल तो सच्चे लगते हैं ..इस लिए... [पूरी पोस्ट]
writer रंजना [रंजू भाटिया]

कविता

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[24 Sep 2009 06:10 AM]

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