सपनो की छाया तले.....
सपनो की छाया तले हम जी रहे हैं ।आज अपना ही लहू हम पी रहे हैं ।नेह मर चुका, अर्थ की सत्ता बढी है,सत्य के होठों को हम सब सी रहे हैं।सपनों की छाया तले हम जी रहे हैं।था कभी वह वक्त, सत्य पूजा जाता।झूठ उस के सामने था, तड़्फड़ाता।आज घुटकर मर रहा रोता अकेला,चल...
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परमजीत बाली
न्याय की तलाश
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[12 Aug 2009 22:11 PM]



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