गुलाब
कई बारचाहा हॆतेरे नर्म होंठों पररख दूं,अपने गर्म होंठ.तेरी खुशबू को बसा लूंअपने दिल में.ऒर पी जाऊंतेरी सुन्दरता कोइन नयनों सेहाला समझकर.लेकिन-तेरे जिस्म के चारों ओरखडे पहरेदारों को देखकरसहम जाता हूंऎ! गुलाब.नया घर...
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विनोद पाराशर
कविता
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[25 Aug 2009 22:58 PM]



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