आज फिर बदली हुई हैं केंचुलें
लड़खड़ाते ज़िन्दगी के कुछ अधूरे प्रश्न लेकरचाहना है उत्तरों की माल अपने हाथ आयेकंठ का स्वर हो गया नीलाम यों तो मंडियों मेंआस लेकिन होंठ नूतन गीत इक नित गुनगुनाये मुट्ठियों की एक रेखा में घिरीं झंझायें कितनीऔर है सामर्थ्य कितनी, कौन अपनी जानता हैचक्रव्यूहों...
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राकेश खंडेलवाल
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[26 Jul 2009 21:20 PM]



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