एक धागा जोड़ रखता
कॄष्ण बन कर गा रहा है आज मेरा मन सुभद्रेहो रहा प्रमुदित निरंतर मन, लिये नेहा तुम्हाराओ सहोदर, वर्ष का यह दिन पुन: जीवन्त करतास्नेह के अदॄश्य धागे, बाँध जो तुमने रखे हैंदीप बन आलोकमय करते रहे हैं पंथ मेराऔर जो अनुराग के पल हैं, सुधा डूबे पगे हैंएक धागा...
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Geetkaar
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[05 Aug 2009 10:27 AM]



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