बासठ वर्षों की आज़ादी

गीतकार की कलम हम स्वतंत्र हैं भूल न जायें, एक बार फिर हुई मुनादीबासठ दिये जला कर अपना, जन्म दिवस करती आज़ादीहम स्वतंत्र हैं जहां धरा पर चाहें वहीं बिछौना कर लेंहम स्वतंत्र हैं जहां चाह हो, अंबर के नीचे सो जायेंहम स्वतंत्र हैं, चाहें पानी पीकर अपना पेट पाल लेऔर अगर... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश खंडेलवाल
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[10 Aug 2009 21:38 PM]

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