पॄष्ठ कोरा पड़ा मेज पर
पॄष्ठ कोरा पड़ा मेज पर पूछता रह गया शब्द मैने जड़े ही नहींलेखनी एक करती प्रतीक्षा र्रही, हाथ मेरे उठाने बढ़े ही नहींशब्द ने ये कहा गीत कोई लिखूँ,या नये रंग में एक रँग दूँ गज़लभावना का न उमड़ा मगर ज्वार फिर छंद ने शिल्प कोई गढ़े ही नहीं. -0-0-0-0-0-0- स्याही...
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Geetkaar
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[16 Aug 2009 21:28 PM]



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