मेरे भीतर का चोर
आदमी बदल जाता है पर नहीं बदलता उसका रंग-रूपआदमी के भीतर हजारों आदमी में से एकजब बदलता है तो बदल जाती है उसकी तस्वीर।कई दिनों से इसी उधेड़बुन में किकब मेरे अंदर का अन्य पुरुष बदल गया।मैं अचंभित था खुद में छुपे चोर को देखकरसच्चाई से डरने वाला मेरे अंदर का...
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गिरीन्द्र नाथ झा
कविता
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[13 Sep 2009 04:46 AM]



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