ग़ज़ल जो ढंग से नहीं छपी ! यहां छपी क्या खू़ब छपी !

samwaadghar ग़ज़लबह गया मैं भावनाओं में कोई ऐसा मिलाफ़िर महक आई हवाओं में कोई ऐसा मिलाखो के पाना पा के खोना खेल जैसा हो गयालुत्फ़ जीने की सज़ाओं में कोई ऐसा मिलाखो गए थे मेरे जो वो सारे सुर वापिस मिलेएक सुर उसकी सदाओं में कोई ऐसा मिलाहमको बीमारी भली लगने लगी, ऐसा भी... [पूरी पोस्ट]
writer sanjaygrover

कविता

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[20 Aug 2009 11:04 AM]

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