ग़ज़ल जो अब तक छपी नहीं, पढ़ो कहीं तो पढ़ो यहीं
ग़ज़लहिन्दुस्तान में हिन्दी जैसी उसकी हालत अपने घर मेंजैसे शीशा देख रहा हो अपनी सूरत इक पत्थर मेंअपने-अपने समय को देखो अपनी-अपनी घड़ी चलाओयारो धोखा खा जाओगे देखोगे गर घंटाघर मेंअपने पुरखे नहीं रहे अब ऐसा कहना ठीक न होगाहमने अकसर देखा उनको घुड़की देते उस बंदर...
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sanjaygrover
कविता
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[14 Sep 2009 01:35 AM]



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