गंगा को एक न एक दिन तो थेम्स नदी बनना ही था.....

काहे को ब्याहे बिदेस.... पता नहीं क्यों उसे लगता था अपने खून के कतरे से वो उसी तरह वाकिफ है जैसे अपने आँखों के रंग से, ठोडी के नीचे पड़े निशाँ से, हाथों पर उभरती नसों से, कलाई पर घडी के नीचे गोलाई में पड़े घेरे से, बालों में उम्र दर्ज करती स्लेटी चमक से, दीमाग में रोज के लिए लिखी... [पूरी पोस्ट]
writer neera
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[21 Aug 2009 11:04 AM]

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