तीन डग में वामन वो, जग को नाप जाता है...

कुछ शब्द कई दिनों बाद फ़िर आपसे मुखातिब हूं, एक गज़ल के साथ जिसे संवारकर कहने लायक बनाया है गुरूदेव पंकज सुबीर जी ने। बहर है-बहरे हजज मुसमन अशतर। इसी बहर की प्रसिद्ध गज़ल जिंदगी की राहों में रंजो-गम के मेले हैं। भीड़ है कयामत की और हम अकेले हैं॥ उस्ताद जफ़र अली की... [पूरी पोस्ट]
writer रविकांत पाण्डेय
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[13 Aug 2009 03:59 AM]

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