चली हवाएं परिवर्त्तन की....

कुछ शब्द लीजिये एक और कविता पेश है, बिना किसी खास भूमिका के। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी।नींव डोलती राजभवन कीचली हवाएं परिवर्त्तन कीसहमी छाती नील-गगन कीबेला फिर शिव के नर्त्तन कीयह इंद्रजाल अब टूटेगाबंधन से मानव छूटेगाहां, फूल नया खिलने को हैधरती, नभ से मिलने को... [पूरी पोस्ट]
writer रविकांत पाण्डेय
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[01 Sep 2009 14:59 PM]

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