मुक्ति
सलाख़ों को हम गुलबदन देखते हैं, नवा-ए-बलाबिल सुख़न देखते हैं, ख़यालात-ए-पैहम की ये ख़ुशख़रामी?कफस में फ़ज़ा-ए-चमन देखते हैं.- हर्ष( गुलबदन - फूलों जैसी नर्म, बलाबिल - बुलबुल का बहुवचन, नवा-ए-बलाबिल - पिंजरे में बंद पक्षियों का आर्त्तनाद, सुख़न - काव्य,...
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हर्ष प्रसाद
बुलबुल
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[11 Aug 2009 13:07 PM]



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