मैंने वो सपना सहेज रखा है...
उनींदी स्याह रातों में...रिश्तों की उलझी डोर से,जिसे तुमने बुना था,वो सपना...मैंने सहेज रखा है...हाँ वही सपना...!!जो तुम्हें जान से प्यारा था..वही सपना...जो तुम्हारे मन का सहारा था...पलकों की चादर फैंक,आज ये कहीं उड़ जाना चाहता है...जब रोकता हूँ इसकोतो...
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मीत
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[24 Aug 2009 03:53 AM]



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