हाँ, तेरे जिक्र से कुछ शेर सँवारे यूं तो...
बहुत साल पहले एक कविता लिखी थी। तब ग़ज़ल के शास्त्र की जानकारी नहीं थी। अब जब थोड़ी-सी समझ आ गयी है इस जटिल शास्त्र की तो यूँ ही खाली क्षणों में बैठ उन पुरानी रचनाओं को कभी-कभी ग़ज़ल के छंद पर बिठाने की कोशिश करता रहता हूँ। ...तो आज पेश करता हूँ एक ऐसी ही...
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गौतम राजरिशी
ग़ज़ल
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[07 Oct 2009 06:53 AM]



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