"अंतर्मन"
"अंतर्मन" अंतर्मन की ,विवश व्यथित वेदनाएं धूमिल हुई तुम्हे भुलाने की सब चेष्टाएँ,मौन ने फिर खंगालाबीते लम्हों के अवशेषों कोखोज लाया कुछ छलावे शब्दों के,अश्कों पे टिकी ख्वाबों की नींव,कुंठित हुए वादों का द्वंद ,सुधबुध खोई अनुभूतियाँ ,भ्रम के द्वार परपहरा...
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seema gupta
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[02 Aug 2009 21:35 PM]



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