मुसीबत का मारा, बेचारा सच

प्रतिवाद इन दिनों सच मुसीबत में है। भीषण मुसीबत में। मुसीबत है कि दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। लोग सच पर सवाल उठाने लगे हैं। शक करने लगे हैं। सच को गरियाया जा रहा है। मीडिया से लेकर आम जन तक हर कोई हर कहीं सच से 'सच' जानना चाहता है। सच पर दवाब बढ़ता जा रहा है।... [पूरी पोस्ट]
writer अंशुमाली रस्तोगी

व्यंग्य

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[24 Jul 2009 01:36 AM]

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