न मैं था कभी, ना मैं हूँ अभी
नासमझ जिंदगी को पता भी नहीं कितनी साँसों की डोर है बाक़ी अभीकल का सूरज दिखेगा इसे या नहींया ये रात अब ना होगी ख़त्म कभी इस पहेली का अब कोई हल भी नहींक्यूं खफा हो गए मुझसे अरमां सभी ये ना सोचूँ में ऐसा कोई पल नहीं इस दुनिया में आया ही था क्यों में कभी किसी...
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WindEnergyMan
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[26 Aug 2009 20:22 PM]



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