देखो चांदनी रात में..........
खोये-खोये से चांद पर,जब बारिश की बूंदे बैठती,और बादल की परत,घूंघट में हो, उसे घेरती,तब फिसल कर गाल पर,एक तब्बसुम खिलने लगे,देखो चांदनी रात में,अम्बर धरा मिलने लगे।कुछ मंद-मंद मुस्कान सी,आंखें चमक बिखेरती,हाथों की लकीरों पे हो जैसे,नाम अम्बर फेरती,यूं धरा...
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PREETI BARTHWAL
poetry
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[30 Aug 2009 20:32 PM]



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